...भोपाल को आंसू बहाते 30 साल हो गए..इन 30 सालों में भोपाल गैस पीड़़ित परिवारों ने इतने आंसू बहाएं होंगे कि दर्द के नीर की एक नई झील छोटी पड़ जाए..इन 30 साल में 30 हजार लोगों ने जान तो गवाई ही साथ ही लाखों लोग जहरीली गैस के चलते कई गंभीर बीमारियों के शिकार हुए..सैंकड़ों परिवार तबाह हो गए..मुआवजे के लिए तरसते रहे..लेकिन बदले में कुछ नहीं मिला और जो मिला भी वो जख़्मों को नहीं भर सकता..जहरीली गैस का भूत तो आने वाली पीढ़ियों तक को बख्शने के मूड में नहीं..आज भी भोपाल में लाखों लोग भयंकर बीमारियों से जूझ रहे हैं..जैसे chest pain, emphysema, cancer..भोपाल और आसपास आज भी जन्म लेने वाले बच्चों में जन्मजात बीमारियां होती हैं जो बाकि देश से 10 गुना अधिक हैं..जानकार मानते हैं कि मध्य प्रदेश पुलिस की कैद से यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वारेन एंडरसन को ‘दिल्ली’ के दबाव से 8 दिसंबर, 1984 को रिहा किया गया. और यह दिल्ली का दबाव किसी और का नहीं उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी का माना जाता है...हमारी सरकार ने यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वारेन एंडरसन को उस समय देश से निकलने में पूरी मदद की जिसकी वजह से हजारों जानें गईं. मेरी दुआ है कि भोपाल गैस पीड़ितों को इंसाफ मिले और पूरा मुआवज़ा भी..क्योंकि भोपाल के दर्द को आंका नहीं जा सकता, सिर्फ बांटा जा सकता है..
Sunday, November 30, 2014
Saturday, October 5, 2013
क्योंकि मैं पाकिस्तानी हिंदू हूं..
मैं नवंबर 2011 में अपने गृहनगर अमृतसर में था कि एक दोस्त का फोन आया कि सैकड़ों पाकिस्तानी हिंदू अपने घर छोड़ वाघा बार्डर पर आए हैं..जो हमेशा के लिए भारत में ही बसना चाहते हैं..मुझे लगा ये एक बेहतरीन स्टोरी है..जबतक मैं अपने घर से 25 km दूर भारत-पाक सीमा पर पहुंचता..वो काफिला आगे बढ़ गया..बस मुझे किसी तरह से ये पता चल पाया कि वो भारत में किसी धार्मिक जलसे में शामिल होने आए हैं..और वो राजधानी दिल्ली भी आएंगे..बस मैं तभी से उनके दिल्ली में पहुंचने का इंतज़ार करने लगा। पर राजधानी दिल्ली में उनका पता लगा पाना आसान नहीं था। फिर लगभग 40 दिन बाद उन लोगों का पता चला जब उन्होने गृह मंत्रालय में गुहार लगाई। तो मैं उस डेरे में अपने कैमरामैन के साथ पहुंचा..तो मुझे एक ऐसा मंज़र दिखा कि वो लोग जैसे अभी-अभी आजाद हुए हो...चेहरों में खौफ..डरी सहमी महिलाएं..कुल उस डेरे में 114 पाकिस्तानी हिंदू थे..पाकिस्तानी हिंदुओं ने मुझको बताया कि पाकिस्तान में उनके साथ बहुत ही बुरा सुलूक होता रहा है एक कन्हैया नाम के लड़के को कैंसर था..लेकिन कैमरे पर उसने भी भारत सरकार से भारत में बसने देने की गुहार लगाई..लेकिन उसके 2 दिन बाद ही उसका देहांत हो गया...सबसे पहले ये स्टोरी तेज़ चैनल पर प्रखर श्रीवास्तव ने चलाई और जितने लोगों ने देखी उनको अच्छी लगी...फिर आजतक में मेरे बॊस शम्स ताहिर खान की ने इसको बखूबी पेश किया और मेरे पास बधाईयों का तांता लग गया। ये स्टोरी मेरी सबसे अभी तक की सबसे बड़ी हिट स्टोरी साबित हुई..मुझे भी इसको करने बाद लगा कि इन लोगों के लिए कुछ अच्छा कर्म करने का मौका मिला..अभी ये पाकिस्तानी हिंदू दिल्ली के आसपास ही हैं और कोर्ट से उनको भारत में ही रहने की इजाज़त मिल गई है..ये स्टोरी बेस्ट स्टोरी कैटेगरी में 2 बार नॊमिनेट हुई और अब इसको गोयनका अवॊर्ड में भी भेजा गया..ये पाकिस्तानी हिंदू आज भी हमारे शुक्रगुजार हैं कि सबसे पहले हमने इनके दर्द को सरकार तक पहुंचाया और कन्हैया की आखिरी इच्छा भी पूरी हुई..कन्हैया चाहता था कि इन पाकिस्तानी हिंदुओं को भारत में बसने दिया जाए..कन्हैया का सपना सच तो हो गया लेकिन वो ये खुशी अपनी आखों से नहीं देख पाया..
Tuesday, July 24, 2012
Thursday, June 7, 2012
हादसों के इस शहर में...क्या पता कुछ भी नहीं
लाख चलिए सर बचाकर...फायदा कुछ भी नहीं
हादसों के इस शहर में...क्या पता कुछ भी नहीं
उस किराने की दुकान वाले को सहमा देखकर
मॉल मन ही मन हंसा..पर कहा कुछ भी नहीं
काम पर जाते मासूम बचपन की व्यथा
आंख में रोटी का सपना और क्या कुछ भी नहीं
कुछ दोस्त दिलों जान से मरते थे जिनपर
लेकिन कहा उनसे कभी कुछ भी नहीं
रात भर एकतरफा इश्क में आहें भरने का तो लिया पूरा मजा
लेकिन इजहार की हिम्मत जिगर में कुछ भी नहीं...
लिखवाई मुझसे भी दोस्तों ने इश्क पर कविताएं..
मेरी मदद का भी फायदा उनको मिला ज्यादा कुछ भी नहीं..
कुछ कामयाब होते. अगर दिल से सच में किसी को चाहा होता..
खुदा से मांगा भी..लेकिन खुदा को सच्चाई उनके इश्क में दिखी कुछ भी नहीं..
लाख चलिए सर बचाकर...फायदा कुछ भी नहीं
दुनिया में ज्यादातर इंसान समझता है खुद को तीस मार खान
खुदा ने बनाया इंसान को ऐसा कुछ भी नहीं..
दुख में इंसान को याद आता है भगवान
सुख में नजर आता कुछ भी नहीं
इस देवगन को नजर आते हैं..ज्यादातर मतलबी इंसान
अच्छे लोगों की गिनती ज्यादा कुछ भी नहीं..
लाख चलिए सर बचाकर...फायदा कुछ भी नहीं
हादसों के इस शहर में...क्या पता कुछ भी नहीं..
Thursday, May 24, 2012
Bas muskurana chahta hon main.aaaaaa
Ik aisa geet gana chahta hu mai
Khushi ho ya gham, bas muskurana chahta hu main !!
Dosto se dosti to har koi nibhata hai !Dusmano ko bhi sabak sikhana chahta hu mai!!
samay acha ho ya bura rab ko bhul nahi jana chahta hoon mai..
bas waheguru ke aage hi sar jhukana chahta hoon mai..
Is Devgan ke dost bade kam par sache hai..dushmano ko bhi yeh batana
chahta hoon mai..
na chahte huye kisi ka dil bhi nahi dukhana chahta hoon mai
haste khelte aise hi 26-27 saal wali jindagi bitana chahta hoon..
kuch alag kar gujrana chahta hoon mai
maa-baap ki duao ka asar dikhana chahta hoon mai..
khushi ho ya gham bas muskrana chahta hoon mai..
bas aise hi jeena chahta hoon mai......
.har baazi jeet jana chahta hoon mai..bas aise hi jeena chahta hoon mai..♥ ♥ ♥
Sunday, November 6, 2011
हिंदी....हिंदोस्तान में, क्यों हो हर जुबान पे...
हिंदी को भारत में राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं है...लेकिन राजभाषा होते हुए भी हिंदी भारत में वो कमाल कर जाती हैं जो शायद ही कोई ओर भाषा कर पाती...पत्रकारिता से जुड़े होने के चलते या वैसे कभी मुझे चाहे यात्रा करने कोई भी मौका मिलता है तो हिंदी की ताकत का अहसास हो जाता है...दुनिया भर में एक मुल्क से दूजे से संपर्क साधने में जो कमाल अंग्रेजी भाषा करती है... वही कमाल भारत में हिंदी करती है...उदाहरण के तौर पर पंजाब, गुजरात को ले सकते हैं...भाषा के आधार पर आज का पंजाब बना..हरियाणा को भाषा के आधार पर ही सियासी दलों नें पंजाब से अलग किया...पंजाब , गुजरात में हिंदी बोल समझ सकते हैं, लेकिन लहजा चाहे इतना शुद्ध हो ना हो...हिंदी को भारत के कोने-कोने तक पहुंचाने में बड़ा योगदान हिंदी फिल्मों का भी हैं...वो बात अलग है कि दक्षिण भारत पहुंचते हिंदी की हालत थोड़ी पतली हो जाती है....वहां पर लोग हिंदी समझ तो लेते हैं..बोलने में झिझकते हैं...आरोप लगते रहे हैं कि वो लोग हिंदी बोलना नहीं चाहते...शायद आजादी के बाद वो प्रसार हिंदी का वहां हो ना पाया हो...इसलिए वहां की फिल्म इंडस्ट्री भी अलग है...वहां तक हिंदी पहुंच भी कैसी पाती..भई हिंदी तो राजभाषा थी ना कि राष्ट्रभाषा....नार्थ-ईस्ट में भी हिंदी की हालत नाजुक ही हैं...मुझे लगता है कि माओवादी या विदेशी ताकतें भारत को तोड़ने की जो कोशिश करते हैं ..अगर हिंदी वहां भी मजबूत होती तो शायद ही उनको इतना बल ना मिलता.. भारत में हिंदी की ताकत को अहसास करना हो तो आप देख सकते हैं कि अब तक हिंदी पट्टी ने देश को कितने प्रधानमंत्री दिए...देश की राजनीति में हिंदी बेल्ट के नेताओं की कितनी तूती बोलती रही है...ये कहना गलत नहीं होगा कि पूरे देश को हिंदी एक धागे की तरह बांध कर रखने में अहम योगदान निभाती हैं...भले ही मेरी मातृ-भाषा जिसे पंजाब में मां-बोली कहते हैं पंजाबी है..लेकिन मेरा हिंदी के प्रति भी पूरा सम्मान हैं..क्योंकि हिंदी के चलते ही मैं ज्यादातर भारतीयों से जुड़ा महसूस करता हूं...
और इससे ही मेरी रोजी-रोटी भी चलती है...
और इससे ही मेरी रोजी-रोटी भी चलती है...
Saturday, October 29, 2011
जब अन्ना के रंग में रंगा ' तिरंगा'
20 अगस्त का दिन मेरी जिंदगी का एक रोमांचक दिन बन गया...अन्ना हजारे की बदौलत..अन्ना का आंदोलन 16 अगस्त को शुरु हुआ था और 20 अगस्त आते-आते ये जनआंदोलन चरम पर था। मैं अन्ना के आंदोलन पर एक स्टोरी करना चाह रहा था जो कुछ हटकर हो..मेरी एक सहयोगी ने कहा कि अन्ना के आंदोलन में तिरंगे कहां से आ रहे हैं, वो ऐसी स्टोरी कर सकती हैं...लेकिन व्यस्त होने के चलते वो चाह कर भी नहीं कर सकती...तुम क्यों नहीं करते मुनीष...मैं क्या बताता मैं तो पहले ही करने वाला था...लेकिन आइडिया को जल्द स्क्रीन पर भुनाना चाह रहा था..मैं अन्ना के ऐतिहासिक आंदोलन पर एक अदद स्टोरी करना चाह रहा था क्योंकि बचपन से ही जेपी आंदोलन के बारे में पढ़ते-सुनते आ रहा था...लेकिन जानकार इसे जेपी आंदोलन से बढ़ा मान रहे थे...इसलिए मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहता था...अन्ना का आंदोलन एक बड़ा आंदोलन इसलिए बनता जा रहा था क्योंकि हर भारतीय हाथ में तिरंगा लेकर रामलीला मैदान पहुंचना चाह रहा था...जो नहीं पहुंच रहा था वो भी टीवी पर देखकर इससे जुड़ा महसूस कर रहा था। देश से हर कोने से लोग आ रहे थे जो अपने को सरकारी नीतियों से त्रस्त मान रहे थे । हाथ में तिरंगा लेकर हमारे कैमरे पर बोलने वालों की कोई कमी नहीं थी...जनसैलाब इतना कि आंखें थक जाए लेकिन हर घंटे के साथ लोग बढ़ते जाए...लोग कहते थे, सर हम फलाने प्रांत से आए हैं, हम सिर्फ आपके चैनल पर ही कुछ कहना चाहते हैं...लेकिन मीडिया के इतने लोगों का भी मेला था जो अपने में भी एक रिकॉर्ड था जो लंबे समय तक कायम रहेगा..राजधानी दिल्ली में रमजान के महीने 24 घंटे तिरंगे बन रहे थे...कारीगर भी खुश थे, फैक्टरी मालिक भी...तिरंगा लेकर पहुंचे क्या बच्चे...क्या बूढ़े अन्ना के रंग में रंगे थे....नारा भी था "मैं भी अन्ना"। तिरंगे के साथ भारतीयों की नजदीकी क्रिकेट मैचों में तो हमने देखी ही हैं लेकिन मैं अपने गृह नगर के वाघा बॉर्डर पर भी देखता आया हूं...पर रामलीला मैदान झूमते भारतीयों की जो नजदीकी तिरंगे के साथ बढ़ी वो वाकये काबिलेतारीफ थी।
Wednesday, December 29, 2010
तिहाड़ की महिला कैदियों को सलाम

तिहाड़ जेल में 1 साल के अंदर तीसरी बार एक स्टोरी के सिलसिले में जाना हुआ...और महिला जेल में दूसरी बार...तिहाड़ जेल अपने आप एक शहर की तरह बसी है...जेल को कुल 10 जेलों में बांटा गया है...अपराधियों को उनके अपराध के हिसाब से रखा जाता है.. कुल 11500 कैदी हैं...लेकिन तिहाड़ जेल में 5500 कैदियों की ही रहने लायक जगह है. जो भी ये जेल दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी जेल है...और बात करे अगर तिहाड़ की महिला जेल की जो जेल नंबर 6 कहलाती है...जिसमें 500 महिला कैदी हैं. महिला कैदियों पर स्टोरी करते हुए मुझे और मेरे कैमरामैन को तीन बार चैकिंग से गुजरना पड़ा...हमारे जूते तक दो बार खुलवाए गए...मेरे कैमरामैन लाल-पीले हो गए कि हम तो पहले भी तिहाड़ में आए हैं पर ऐसी चैकिंग पहले तो कभी नहीं हुई...मैने याद दिलाया कि हम महिला जेल में हैं...जहां हमारे चैनल की दो ही टीमें पहुंच पाईं हैं...जिनमें से एक हमारी टीम है...क्योंकि जब तक डीजी ओके नहीं करते...तब तक महिला जेल तक पहुंच पाना नामुमकिन है...पिछले साल महिला कैदी के गर्भवति होने के बाद मीडिया का पहुंच पाना नाको चने चबाने से कम नहीं...खैर हमारे मोबाइल, पर्स जमा कर लिए गए...अगर सही कहें तो हमारे कपड़े और कैमरे का ही साथ था...आखिकार हम सैलून में पहुंच गए...जिसकी हम स्टोरी के लिए पहुंचे थे...कैमरामैन संजीव के मुंह से निकला वाह...क्या ये जेल है या स्वर्ग है..हमारे पास कुछ मिनट का ही समय था...मैने जल्द शोट बनाने को कहा...सैलून में लगभग 25 कैदी थी जिनको जेल में सैलून की ट्रेनिंग हबीब की टीम दे रही थी...मैंने पिछले साल दीवाली पर इस जेल में एक स्टोरी की थी....कुछ चेहरों को पहचानने की कोशिश कर ही रहा था कि दो महिला कैदी आईं और अंग्रेजी में बोली कि प्लीज डान्ट शूट अस..इसी बीच एक 35 के करीब की कैदी पानी लेकर आईं...उन्होने कहा मेरी भी फिल्म मत बनाना...आपने मुझे पहचाना देवगन जी...मैंने कहा हां ...आपने पिछली बार भी यही कहा था....फिर उन्होने कहा कि आप बहुत स्मार्ट लग रहे हो...ये सुनकर मुझे लगा कि मैं कोई बड़ा स्टार हूं और इधर-उधर से कई चेहरे मुझे निहार रहे थे...कैमरामैन बोले जनाब टीआरपी अच्छी है...पर ये स्टार तो अपनी पीटीसी की लाइने भूल गया था...वक्त बहुत कम था...बड़ी मुश्किल से पीटीसी मन में याद कर की जा सकी...महिलायों के चेहरे पर सीखने का जज्बा और एक प्राकृतिक खुशी थी...प्राकृतिक इस लिए क्योंकि रोजमरा कि जिंदगी में हम और आप कितनी बनावटी हंसी हंसने को मजबूर होते हैं...आफिस के जिस सहयोगी से हम बात भी नहीं करना चाहते वो भी अगर हैलो बोले तो बनावटी हंसी से जवाब देना ही पड़ता है...और ये बात खासकर महिलाओं पर पक्के तरीके से लागू होती है...जहां पुरुष सहयोगियों को ना चाहते भी हाय-हैलो का जवाब देना पड़ जाता है...खैर ये बात तिहाड़ की महिला कैदियों पर लागू नहीं होती...क्योंकि वो बनावटी हंसी की दुनिया से बहुत दूर हैं...पुरुष प्रधान समाज से दूर हैं...इसीलिए मुझे एक बार भी नहीं लगा कि मैं जेल में हूं...कुछ महिला कैदियों से बात भी हुई...उनका कहना था क्राइम तो हो गया...लेकिन हमारी जिंदगी अभी बहुत लंबी है...हमें सुधरने का मौका मिला...हम समाज में जाकर अपने हाथों के हुनर से पैसे कमाएंगी...उनकी खुशी देखकर मुझे भी एक अच्छी सीख मिली कि हम फालतू ही दुखी होते रहते हैं...वैसे मैं और मेरी एक घनिष्ठ सहयोगी इस बात को मानते हैं कि इंसान तभी तक दुखी होता है जबतक वो दुखी होना चाहते हैं...हां कभी कभार हालात आपके बस के बाहर हो सकते हैं हमेशा नहीं....इसलिए किसी ने ठीक ही कहा है कि चिंता चिता समान...मुझे पता था कि मेरी ये स्टोरी हिट ही होगी...और जितना सोचा उससे अच्छा नतीजा मेरे सामने था...मेरी मां ने पहली बार मेरी किसी स्टोरी को देखने के बाद कहा कि बेटा तुम बहुत स्मार्ट लग रहे थे...मैंने मां को कहा कि एक महिला कैदी ने भी ये बात कही...मां ने कहा, मरजानी मेरे मुंडे को कही नजर तो नहीं लगा दी उसने...अब क्या बताता मां को... नजर तो पहले ही लग चुकी है...अब किसी नजर का कोई असर नहीं होने वाला....खैर उन तमाम करीबी लोगों का शुक्रिया जिन्होने गुड लक बोला था...जिनके चलते मुझे अच्छा काम करने की प्रेरणा मिलती है....
Tuesday, November 23, 2010
छोटे शहर के बड़े दिलवाले...


मैं अक्सर सोचता हूं कि काश मैं भी एक बड़े शहर में पैदा हुआ होता तो क्या होता...तो सबसे पहले तो मैं ये ब्लाग नहीं लिख रहा होता...दूसरा-तीसरा -चौथा कई कारण हैं...
छोटे शहर के अमीर भी बड़े शहर की भीड़ में कितने गरीब हो जाते हैं...ये मुझसे बेहतर कौन जान सकता है...मैं अक्सर अपने दोस्तों से कहता रहता हूं कि आदमी दिल से अमीर होना चाहिए..मुझे जवाब मिलते हैं कि दिल की अमीरी का अचार मुझे ही मुबारक हो...मेरा मानना है कि छोटे शहर के लोग वाकई दिल से बहुत अमीर होते हैं...बड़े शहरों में दिनदहाड़े घर लुट जाते हैं और पड़ोसियों को कानो-कान खबर नही होती...और छोटे शहरों में आपकी फ्रिज में क्या-क्या रखा है...यहां तक की खबर पड़ोसियों को होती है...पड़ोसियों की इज्जत रिश्तेदारों से ज्यादा होती है...औरतें पड़ोस में ही बहनें ढूंढ लेती हैं..जैसी मेरी मां ने निर्मल आंटी और ओमी आंटी नाम की धर्म बहनें बना ली...जब भी मैं अपने घर अमृतसर जाता हूं तो पड़ोस की आंटी का सरसो का साग बड़े स्वाद से खाता.हूं..छोटे शहरों में पड़ोसी दाल-सब्जी और दर्द सब बांटते हैं...मैं ऐसे बड़े दिल की बात करता हूं...जो दिलवालों की दिल्ली में फिट नहीं बैठती...अगर मैं भी बड़े शहर में पैदा हुआ होता तो मैं भी कई गर्लफ्रेंडस बनाने में विश्वास रखता...तो आजतक मैंने भी महिला मित्रों के साथ अकेले फिल्म देखने की हिम्मत जुटाई होती.
...अगर बड़े शहर में पैदा हुआ होता तो जिंदगी की पिच पर कभी हार ना मानने का जज्बा कैसे आया होता...रग-रग में जीतने का हौंसला कैसे समाया होता...खैर कुछ टीचर मेरी जीत की प्यास को देखकर कहते थे कि ये फौजी का बेटा हार नहीं मानता...इसे स्पोटर्स कैप्टन बना दो...
मेरा शहर छोटा था लेकिन मुझे संस्कार बहुत बड़े मिले...हमेशा वहां सबके चेहरे खिले रहते थे...जहां लोग हर दुख-सुख में एक साथ सहा करते थे...हम भी कभी ऐसे ही एक शहर में रहा करते थे...इस शहर में हर कोई खाने को दौड़ता है..दोस्त-दोस्त कहकर पीठ में कई लोगों से छुरा खा चुके हैं...इस लिए दोस्त बनाने में चूजी हो गए हैं हम...जो अच्छा लग जाए बस लग जाता है...जो पसंद ना आए वो पीछे छूट जाता है... दोस्तों पर जान देने का जज्बा मैंने अपने शहर से ही सीखा...मेरे शहर में मेरा एक ही दुश्मन बन गया था जो मेरे सबसे करीबी दोस्तों का दुश्मन था .. अब वो इस दु्निया में नहीं है...बड़े ही फिल्मी अंदाज़ में एक लड़की के प्रेम में आत्महत्या कर ली उसने... खैर बड़े शहर की बड़ी बातें हैं...महिलाओं के लिए ये दिल्ली शहर कैसा हैं ये तो सब बखूबी जानते हैं..रोजाना छेड़खानी की वारदातें बड़े शहर के बड़े दामन पर कई दाग लगाती जाती हैं जिनको छुड़ा पाना नामुमकिन है...अक्सर मेरे दिल में ख्याल आता है कि छोटे शहर के बड़े दिलवाले ज्यादा अच्छे हैं या बड़े-बड़े शहरों के छोटे दिलवाले...
Wednesday, November 3, 2010
मेरा लैंडलाइन दुनिया छोड़ गया...

आज मैं थोड़ा परेशान हूं...क्योंकि मेरे घर का लैंडलाइन फोन कट गया हमेशा के लिए...मेरा दोस्त...0183-2276504...परिवार में सभी इसको लंबे समय से कटवाना चाहते थे...मैंने हमेशा इसका विरोध किया...हम तो घर से पहले ही अपने मंजिल की तलाश में निकल चुके थे...घरवालों ने फोन को भी घर निकाला दे दिया...मैंने लाख जानना चाहा तो मेरी मां बोलीं हर कोई तो मोबाइल पर ही फोन करता है...और घर के हर सदस्य के पास मोबाइल है...बेटा तुम भी तो मेरे मोबाइल ही फोन करते हो...लेकिन मेरे लैंडलाइन से मेरी बहुत अच्छी यादें जुड़ी हैं...कईं शरारते जुड़ी है...फोन ने मुझे स्कूल के होनहार विद्यार्थी से कॉलेज की राजनीति का वाइस प्रेजिडेंट बनते देखा...मास कॉम की कक्षा में अव्वल आने की खबर भी सुनाई...
मेरे दोस्त लैंडलाइन का जन्म... मुझे आज भी याद है जब मैं कक्षा पांच में था...तब हमारे घर लैंडलाइन की नींव पड़ी...घर में अजब खुशी का माहौल था...फोन लगाने वाले बीएसएनएल कर्मचारियों को कैश बधाई के बाद...घर में पड़ोसियों की भीड़ को खुशी में बरफी परोसी गई...पंजाबी तो वैसे ही खुश होने का बहाना तलाश लेते हैं...ये खुशी उस युग में बहुत बड़ी थी...मेरी दादी को खुशी थी कि अब वो तीनों बेटियों से आराम से बात कर पाएंगी...वो फोन की घंटी मुझे आज भी याद है...जब देर रात बजती तो सबकी धड़कने तेज़ हो जाती कि इस वक्त कोई बुरी खबर तो नहीं...क्योंकि लैंडलाइन लगने के कुछ महीने बाद ही मेरे बड़े मामा की मौत की खबर देर रात को ही मेरी मां सुनकर गिर पड़ी थीं...तो ऐसी कई बुरी-अच्छी यादें लैंडलाइन के साथ जुड़ी थी...जब मैं कक्षा 10, 11 में था तो अक्सर ऐसी कॉल आती थी जिसे ब्लैंक कॉल कहते है...मेरी मां कहती थीं कि मेरे घर में कोई बेटी नहीं फिर ये कमबख्त कौन कुड़ी है जो मेरी आवाज सुनकर फोन काट देती है...तेरी तो सहेली नहीं कोई...बेटा वो मुझसे बात करे मैं उसे प्यार से समझाती हूं.. मेरे फोन उठाने पर भी फोन कट जाता...बस पंजाबी गाने सुनते थे...मैं आज तक समझ नहीं पाया कि वो कौन सी फैन थी...ये आज भी पहेली है...खैर मेरे कई दोस्त जो विदेशों में बसे हैं...उनकी जब अपनी बचपन की प्रेमिकाओं से बात ना हो पाती तो दोस्त बेहद दुखी होकर मुझसे मदद मांगते...मेरे से डायलॉग लिखवाते जिसमें..बड़े हौंसले के साथ
लड़की की मां के फोन उठाते ही बोलना कि हैलो आंटी, ममा बोल रहे हैं कि शाम को किटी पार्टी पर आ जाना...बेटे कौन ...आंटी तुसी निर्मल आंटी..नहीं पुतर..ओके आंटी...लैंडलाइन का दौर प्रेमी जोड़ों के लिए बेहद कठिन दौर था...आज तो मोबाइल ने ही प्रेम करने वाले जोड़ों की तादाद देश में बढ़ाई है और ये हमारी आपकी सबकी जिंदगी कहें या परिवार का एक हिस्सा बन चुका है...जिसके चलते हजारों लैंडलाइनों की बलि दी जा रही है...और मेरा प्यारा लैंडलाइन भी उनमें से एक था...
Monday, October 25, 2010
हिट- फिट करवाचौथ क्या है...



करवाचौथ को कुछ ही घंटे शेष हैं और बाजारों में महिलाओं का जमकर खरीददारी का दौर चल रहा है...बाजार हो या बॉलीवुड हर किसी ने करवाचौथ के व्रत को खूब भुनाया है...अक्सर मेरे दिल में करवाचौथ को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं...मैं भारतीय महिलाओं की तपस्या या व्रत पर सवाल नहीं उठाने जा रहा हूं जो अपने पति की लंबी उम्र के लिए सदियों से करवाचौथ रखती आई हैं...क्योंकि मैंने बचपन से अपनी मां को भी करवाचौथ का व्रत रखते और इसकी तैयारी के लिए उतावलापन देखा है...शाम को प्यासे चेहरे को बड़ी हिम्मत के साथ चांद का इंतज़ार करते देखा है...लेकिन सवाल कई खड़े होते हैं कि हमारे देश में हमेशा व्रत, सारे नियम महिलाओं के लिए क्यों बने...क्यों नहीं मर्दों के लिए हमारे देश में सदियों से कोई व्रत नहीं बना...क्योंकि उनको पत्नी की लंबी उम्र से क्या लेना...पत्नी मर भी जाएगी तो दूसरी शादी हो जाएगी...लेकिन अगर एक औरत का पति उसके जीते जी मर जाए तो उसके लिए सती प्रथा भी इसी देश में थी जो समाज के ठेकेदारों ने ही बनाई होगी। आज के दौर में उत्तर भारत का ये व्रत पूरे देश में मनाया जाने लगा तो इसमें यश चोपड़ा की फिल्मों का अहम रोल है...डीडीएलजे में सिमरन ने राज के लिए जो किया...आज ज्यादातर हर युवा कर गुजर सकता है...युवा सच में यश चोपड़ा के शुक्रगुजार है कैसे पंजाबी व्रत को देश भर में हिट कर दिया...जालंधर छोड़े हुए उनको पांच दशक हो गए...लेकिन यश चोपड़ा ने अपनी फिल्मों में ऐसा पंजाबी तड़का लगाया कि सारा बाजार कायल हो गया...शाहरुख सुपरस्टार बन गए यश जी के चलते...यश जी की फिल्में हिट हुईं करवाचौथ के फेर में...
लेकिन उन महिलाओं को सलाम करने को दिल बार-बार करता है जो सदियों से कष्ट सहकर भी ऐसे व्रत का पालन करती आई है...चाहे वो आज की गृहिणी हो जा जेट उड़ाने वाले महिला पायलट...
आज नये शादीशुदा जोड़े या पति देव या ब्वॉयफ्रेंड अपनी संगिनी को खुश करने के लिए व्रत रखते हैं...उम्मीद करता हूं कि वो ताउम्र ऐसा कर सकें...लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि मै नही चाहता कि मेरी श्रीमति भी मेरे लिए व्रत रखें..
क्योंकि मेरे हाथों में उम्र की रेखा पहले ही काफी लंबी है..इस लिए मेरी लंबी उम्र के लिए कोई दर्द क्यों सहें...जो मैं देख ना पाऊं....उम्मीद करता हूं वो शायद इसे समझ इसे समझ पाएगी।...
Monday, October 11, 2010
पहले मेट्रो कोच में सुहाना हुआ सफर...मगर


महिलाओं के नाम हो चुका है दिल्ली मेट्रो का पहला कोच...वाकई किसी ने सोचा ना था महज चार कोच वाली मेट्रो का एक कोच महिलाओं को इतनी जल्द मिल जाएगा...इस कोच ने जहां महिलाओं को काफी राहत पहुंचाई है...वहीं कुछ लोगों को ये बात गले नहीं उतर रही कि पहला कोच महिला स्पेशल होने के चलते पूरा भरता भी नहीं...वहीं बाकी कोच खचाखच भरे रहते हैं...अरे भैया भरे भी रहते हैं तो मर्दों से ही ना...सीधा क्यों नहीं कहते कि महिलाओं के ना साथ चलने से ग्लैमर कम हो गया है...कुछ लोगों का कहना है कि एक कोच नया जोड़ दिया जाता जिसको महिला स्पेशल बना देते...अब भाई साहब राय देने का कौन सा टैक्स लगता है...कुछ भाई साहब तो पहले कोच में ही सवार होना शान समझते हैं...सब कुछ जान कर भी अंजान खड़े रहते हैं...ये बाबू टस से मस तभी होंगे जब डीएमआरसी पकड़ कर जुर्माना लगाएगी.... कोच नंबर दो से ये नजारा साफ दिखता है जैसा मैंने देखा है....महिला कोच के चलते जहां महिलाओं ने राहत की सांस ली...वहीं ये कोच कुछ प्रेमी जोड़ों का भी प्यार का दुश्मन बन बैठा है... द्वारका लाइन पर एक जोड़ा हाथों में हाथ लिए खचाखच भरे कोच नंबर दो में सवार होता है...भीड़ के चलते लड़की पहले कोच की तरफ बढ़ती है...बेचारा लड़का वहीं खड़ा रहता है...लड़की महिला कोच से प्यार भरे...तो कभी गुस्से भरे इशारे करती है...लेकिन दूसरे कोच के किनारे से आदर्शवादी लड़का हिम्मत नहीं जुटा पा रहा...लड़की वापस आती है...हाथ पकड़ कर लड़के को महिला कोच में ले जाती है...लड़के को आंटियां एक अपराधी की तरह देख रही हैं जैसे वो कसाब का छोटा भाई हो...प्यार भरी कोई बात भी नहीं हो पा रही...पहले तो आधे घंटे का सफर किसी भी कोच में बिंदास कटता था...लेकिन अब लड़की को दूसरे कोच की भीड़ से दिक्कत तो लड़के को आंटियों से...
दिल्ली मेट्रो ने 2002 में अपनी शुरुआत से ही लाखों लोगों की जिंदगी आसान बना दी...वहीं सैकड़ों प्रेमी जोड़े का इश्क भी मेट्रो स्टेशनों या मेट्रो में रंग लाया होगा...इसके गवाह हम और आप ही नहीं स्टेशनों की वो सीढ़ियां भी है जिन पर कई जोड़ों ने अपनी डेट पूरी की होगी...डीएमआरसी को एक कोच ऐसे महान जोड़ों के नाम करने पर भी विचार करना चाहिए...जब जेएनयू कैंपस में प्रेमी जोड़ों के नाम जगह दी जा सकती है तो मेट्रो में क्यो नहीं....जहां मेट्रो का पहला कोच लेडीज स्पेशल होना तारीफ के काबिल है...विरोध होना तो सामान्य है...जब-जब इस देश में महिलाओं को किसी भी क्षेत्र में आरक्षण दिया जाएगा तो थोड़ा शोर-शराबा तो होगा ही...क्योंकि कुछ को आदत नहीं है ऐसे आरक्षणों को हजम करने की...
Thursday, September 9, 2010
महिलाओं का सम्मान क्यों करें...

बचपन से पढ़ता-सुनता आया हूं कि भारतीय सनातन संस्कृति दुनिया में सबसे पुरानी है...कभी-कभी मैं सोचता हूं कि जिस देश में राखी जैसा पवित्र त्यौहार मनाया जाता रहा है...उसी देश में दुनिया के सबसे ज्यादा इव टीजर्स होंगे..बड़ी शर्म की बात है..आखिर ये उसी देश में क्यों जहां बहन को सदियों से भाई रक्षा का वायदा देते रहे हैं...आज भी ज्यादातर भाई अपनी बहन की तो सुरक्षा चाहते हैं लेकिन दूसरे की बहन की ऐसी-तैसी..कोई अपनी बहन को छेड़ दे तो उसे कच्चा चबाने का दम रखते हैं...भई मर्द जो ठहरे..गुस्सा तो आता ही होगा..लेकिन ये कैसी मर्दानगी जिसमें दूसरी की बहन को छोड़ो मत...और हमारी बहन को छेड़ो मत...लेकिन हर भाई ऐसा है ये मैं नहीं कहता...मेरे कई काबिल दोस्त ऐसे हैं जिन्होने कभी इव टीजिंग में हिस्सा नहीं लिया...मेरा मानना है कि ये चीजें संस्कारों से मिलती हैं..जैसा कीड़ा बचपन में बैठ गया वैसे ही हम-आप बन गए..शहरी भारत को छोड़ दे तो आज भी महिलाएं अपने हकों के लिए जूझ रही हैं...सच तो ये है .मेरी ये बातें कुछ मर्दों को चुब जाती हैं...मैं अक्सर ये सवाल पूछता हूं -कि कितनी बार बस-ट्रेन में अगर कोई महिला खड़ी हैं तो उसे आपने सीट आफर की है...हां कोई खूबसूरत लड़की होगी तो उसे सीट मिलने के चांस ज्यादा होते हैं..हम अगर ये सोच ले कि मेरी थकी मां अगर इस आंटी की जगह खड़ी हो तो हम सीट देंगे जा नहीं...ये अपने दिल से पूछ सकते हैं...जवाब मिल जाएगा...ये मेरा आज़माया हुआ फॉर्मूला है...इस लिए मुझसे महिलाओं की इज्जत हो जाती है...और बुरे कर्मों से बच जाते हैं हम...मैं एक सवाल और पूछता हूं कि कितनी बार किसी लड़की के कम कपड़े देख कर आपकी नजरे झुक गयी...या नहीं...मानते हैं कि कम कपडे़ थे लेकिन सारा दोष लड़की पर फिर से...ये हमारे समाज का हिस्सा बन चुका है...मुझे लगता है कि महिलाएं भी इस फितरत को बखूबी समझती होंगी....ज्यादातर खोट दिमागों में भरी हुई है...जिनके कीड़ों की सफाई बहुत जरुरी है....बहुत जरुरी है.
Tuesday, September 7, 2010
एक था सतीश...एक है कॉमनवेल्थ का शेरा

शेरा कॉमनवेल्थ खेलों का शुभंकर...इसे हम लोग रोज़ टीवी पर, बैनरों पर अक्सर देख ही लेते हैं...लेकिन इस मास्क के पीछे के चेहरे को मैंने देखा है...बड़े करीब से...शेरा बने सतीश की कहानी बड़ी दिलचस्प है...चंडीगढ़ से काम की तलाश में दिल्ली के चक्कर लगाना...और फिर अचानक शेरा बनने के बाद जिंदगी ने कैसी करवट ली...ये तो चैनल, अखबार सभी ने छापा...कुछ ऐसी चीज़े भी है...जो सतीश कभी किसी को नहीं बताता..मुझे याद है जब दो महीने पहले मैं कॉमनवेल्थ हेडक्वार्टर में शेरा पर स्टोरी करना गया तो सतीश से मेरी पहली मुलाकात हुई...लेकिन खेलों का शुभंकर वहा हाउसकीपिंग का काम भी करता है..देख मुझे हैरानी हुई..सतीश ने बताया कि वो यही काम करने आया था...लेकिन आयोजकों ने, शेरा की जो ड्रेस बन कर आयी थी..उसे पहनने को कहा..मैं पहन कर आया..सर को वो भा गया...बस ऐसे बन गया खेलों का शुभंकर शेरा...सतीश ने मुझे कई निजी बातें भी बताई...चाहता तो अपनी स्टोरी में और मसाला डालने के लिए चला सकता था...लेकिन मेरे दिल ने साथ नहीं दिया...क्योंकि मुझे पता था कि मसाले के बिना भी मेरी स्टोरी हिट होगी,...हुआ भी कुछ ऐसे ही..सतीश अक्सर मुझसे फोन पर कई चटपटी बातें करता है...एक दिन उसके मुंह से निकल गया कि वो आजतक चैनल (जहां मैं रोज़ी-रोटी कमा रहा हूं...) में सबको जानता है,,,मैंने कहा कैसे...शेरा का कहना था कि वहा उसका दोस्त हाउसकीपिंग करता रहा है...मैंने पूछा सतीश अगर तुम भी करते रहे हो..तो क्या हुआ...कोई काम छोटा नहीं है...आज तुम कितना बड़ा काम कर रहे हो शेरा बनकर...सतीश ने खामोश रहकर भी मेरे सवाल का जवाब दे दिया...लेकिन आपने कभी सोचा है जो शेरा खेलों को प्रमोट करने में रात-दिन एक कर रहा है...उसे आजकल एक डर भी सताता है...खेलों के बाद कही गुमनामी में खो जाने का डर...अक्सर 10 किलो की ड्रेस में हमेशा हंसना आसान नहीं...मास्क पहन कर वो अगर रोता भी है...तो भी हम और आप उसे देख नहीं सकते...मैंने देखा है करीब से...भारत में 'save the tigers' नाम की एक मुहिम चल रही है..मैंने और मेरे एक काबिल दोस्त ने भी शेरा के लिए कुछ करने की सोची है...तांकि वो खेलों के बाद कही फिर से गुमनामी के अंधेरे में ना खो जाए...
Thursday, August 26, 2010
ये कॉमनवेल्थ क्या बला है...


कॉमनवेल्थ खेल हैं क्या मैने सोचा क्यों ना ये सवाल दिल्ली से 400-500 किलोमीटर दूर जा कर आम भारतीयों से पूछा जाए...मैंने सोचा शुरुआत वाघा बार्डर के करीब गांवों से करता हूं। इससे पहले मैं किसी से कुछ पूछता शताब्दी ट्रेन में मुझसे ही इंग्लैंड से आए एक विदेशी जोड़े ने पूछ लिया...क्या खेल हो पाएंगे...आपका मीडिया तो नेगेटिव ही बता रहा है...मैंने जैसे-तैसे समझा कर राहत की सांस ली...मैंने समझा तो दिया कि खेल तो होंगे लेकिन किस स्तर के होंगे कह नहीं सकता...मैं झूठी उम्मीद क्यों बंधाता...इन विदेशी सवालों ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि यार अपने भारत की साख तो मजाक-मजाक में दांव पर लग गई है...जिस तरह हमारे पीएम साहब आजकल खेलों को लेकर परेशान है...मैं भी थोड़ा परेशान हुआ...मैंने सोचा कि पहले तो मेरे और पीएम की बीच तीन ही समानताएं थी...लो अब चार हो गईं...पहली उनका गृह नगर अमृतसर है और मेरा भी...दूसरी वो भी आजकल दिल्ली में रहते है....मैं भी... तीसरी वो खेलों के आयोजन को लेकर परेशान हैं....मैं भी। चौथी वो खेलों की खबरों को करीब से पढ़ते-देखते हैं और मैं भी...मेरा पत्रकार का पेशा ही ऐसा है खेलों की हर खबर पर नजर रखनी पढ़ती है। खैर मैंने पूछना शुरू किया तो हर 10 में 9 लोगों को पता ही नहीं था ये कॉमनवेल्थ क्या बला है...दिल्ली में रहते हुए हम और आप तो जानते हैं लेकिन आम भारतीय तो महंगाई पर लगाम लगनी चाहिए ये चाहत रखता है। कुछ अच्छे जवाब थे खेलों से पेट नही भरेगा...ये खेल-सेल क्या है जी हमें क्या मतलब, कॉमनवेल्थ तो एक देश का नाम है जी...उस कंट्री का वीजा लग जाएगा....ये तो पंजाब के लोग थे...आप भारत में दिल्ली से दूर कही भी आजमा सकते है ऐसे ही जवाब मिलेंगे। खेलों पर हमारा 12 हजार करोड़ से ज्यादा पैसा लग गया...ये मजाक तो नहीं था...अब मैं भी पीएम की तरह दुआ ही कर सकता हूं मेरे भारत की साख को दाग ना लगे। क्योंकि दुआ से ही चमत्कार हो सकता है...चमत्कार से ही खेलों का बेड़ा पार हो सकता हैं....
Saturday, August 21, 2010
पाक बाढ़ की तस्वीर
पाकिस्तान बने पूरे 63 साल हो गये... पड़ोसी देश के इतिहास में अब तक की सबसे भीषण बाढ़ आयी हुई है.. लगभग 17 हजार लोगों को बाढ़ ने लील लिया है। लाखों लोग बेघर हो गए...पाक सरकार बड़ी बेबस नजर आ रही है...आर्थित तौर पर पहले ही कमजोर हमारे पड़ोसी की कमर बाढ़ ने तोड़ दी है...सारी दुनिया पाक की मदद के लिए आगे आ रही है...पड़ोसी देश सबकी मदद ले रहा है लेकिन भारत की 23 करोड़ की मदद लेने में शर्म
आ रही है...वाघा के रास्ते आलू की खेप लाहौर पहुंच चुकी है...तीन युद्ध लड़े है पड़ोसी को शर्म तो आएगी ही..वैसे पाक में कुछ लोग बाढ़ के लिए भी भारत को दोष दे रहे हैं...कहते है भारत ने पानी ज्यादा छोड़ दिया... भारत में भी कुछ लोग पाक को मदद देना सही नहीं मानते..कोई उनको समझाये कि बाढ़ से जूझ रहे आम पाकिस्तानी भारत के दुश्मन नहीं है...दुश्मन तो चंद लोग है जो हमेशा भारत के खिलाफ साजिश रचने को तैयार रहते हैं...लेकिन ये बाढ़ बहुत बड़ी है...मुझे ये करीब से देखने को रोज़ मिलता है क्योंकि टीवी प्रोडक्शन से जुड़ने के चलते वीजूयल्स को काट-छाट कर चलाना पड़ता है...कैसे मदद के लिए बांटे जा रहे पैकेट पाने के लिए भीड़ भागती है...मुझे 1947 की याद दिलाती है...एक तरफ बंटवारे के बाद भारत बहुत आगे बढ़ा गया..वहीं पाक हर मसले पर भारत से बहुत पीछे नजर आता है,,,यही बात पड़ोस में बैठे कुछ लोगों को बहुत चुबती है...
पाक ने हाल ही में माना है कि देश को भारत से ज्यादा खतरा घरेलू तालिबान से है...उम्मीद है कि ये बात पाक शासकों को भी जल्द समझ आ जाए...वैसे मुझे पड़ोसी देश में अपने पुश्तेनी घर की बड़ी फिक्र हो रही है..सुना है पाक पंजाब का वो हिस्सा भी बाढ़ की चपेट में है...मैं सिर्फ दुआ के अलावा कुछ भी नहीं कर पा रहा हूं... नीचे आप कुछ तस्वीरों में बाढ़ का भयानक रुप देख सकते हैं।
आ रही है...वाघा के रास्ते आलू की खेप लाहौर पहुंच चुकी है...तीन युद्ध लड़े है पड़ोसी को शर्म तो आएगी ही..वैसे पाक में कुछ लोग बाढ़ के लिए भी भारत को दोष दे रहे हैं...कहते है भारत ने पानी ज्यादा छोड़ दिया... भारत में भी कुछ लोग पाक को मदद देना सही नहीं मानते..कोई उनको समझाये कि बाढ़ से जूझ रहे आम पाकिस्तानी भारत के दुश्मन नहीं है...दुश्मन तो चंद लोग है जो हमेशा भारत के खिलाफ साजिश रचने को तैयार रहते हैं...लेकिन ये बाढ़ बहुत बड़ी है...मुझे ये करीब से देखने को रोज़ मिलता है क्योंकि टीवी प्रोडक्शन से जुड़ने के चलते वीजूयल्स को काट-छाट कर चलाना पड़ता है...कैसे मदद के लिए बांटे जा रहे पैकेट पाने के लिए भीड़ भागती है...मुझे 1947 की याद दिलाती है...एक तरफ बंटवारे के बाद भारत बहुत आगे बढ़ा गया..वहीं पाक हर मसले पर भारत से बहुत पीछे नजर आता है,,,यही बात पड़ोस में बैठे कुछ लोगों को बहुत चुबती है...
पाक ने हाल ही में माना है कि देश को भारत से ज्यादा खतरा घरेलू तालिबान से है...उम्मीद है कि ये बात पाक शासकों को भी जल्द समझ आ जाए...वैसे मुझे पड़ोसी देश में अपने पुश्तेनी घर की बड़ी फिक्र हो रही है..सुना है पाक पंजाब का वो हिस्सा भी बाढ़ की चपेट में है...मैं सिर्फ दुआ के अलावा कुछ भी नहीं कर पा रहा हूं... नीचे आप कुछ तस्वीरों में बाढ़ का भयानक रुप देख सकते हैं।
Thursday, August 19, 2010
खेलों में समय कम बचा है...हाहाकार मचा है...
कॉमनवेल्थ खेलों को कम समय बचा है, लेकिन चारों तरफ मानो जैसे हाहाकार मचा है। दिल्ली का पूरा सरकारी तंत्र देर से ही सही ऐसी तैयारी में जुटा है मानो देश में कॉमनवेल्थ खेल नहीं विश्व युद्ध होने वाला है... विश्व युद्ध में हवाई हमलों के शिकार देश मलबे में बदल जाते थे.. साडी दिल्ली भी कुछ ऐसे ही खुदी पड़ी है... मलबे के ढे़र आम है.... फर्क सिर्फ इतना दिल्ली में युद्ध नहीं खेल होने है...लेकिन तैयारियां युद्धस्तर पर जरुर चल रही हैं.
मैं सोचता लोगों को अब क्यों कमियां खल रही है.. पहले हम और आप क्यों मान बैठे थे कि कॉमनवेल्थ खेल हिट होंगे... खैर अभी खेलों को हिट -प्लॉप करार देना जल्दबाज़ी होगी...लेकिन इतना जरुर है कि घोटालों की परते खुलते ही काफी लोगों की कुर्सीयां चली जाएंगी...खेलों का बजट बढ़ते-बढ़ते 12 हजार करोड़ पहुंच गया...कोई कहता 12 नहीं 16 हजार करोड़... ये खुलासे तो खेलों के बाद होने वाले खेलों उर्फ बड़े-बड़े पोल खोलो पर छोड़ देना चाहिए...जवाहार लाल नेहरु स्टेडियम पर 961 करोड़ खर्च होने की बात की जा रही है... कहते है कि नेहरू स्टेडियम की छत पर ही 100 करोड़ का खर्च आ गया..अरे भाई विदेशी कोटेड ग्लास फाइबर से बनी छत है जो बड़े-बड़े आंधी तूफानों से स्टेडियम का बचाव करेगी...जैसे मैंने एक ब्लॉग में पहले भी जिक्र किया था कि थोड़ा बहुत पैसा गेहूं रखने वाले गोदामों की छतों पर भी खर्च कर दिया जाता...तो लाखों टन गेहूं हर साल जाया ना जाता..
दिल्ली की सीएम शीला जी कहती है कि हम तो ओलंपिक के लिए भी तैयार है.. कोई मैडम को समझाये कि वो दिल मजबूत रखे और खेलों के नाम पर आलोचना झेलने के लिए भी जरा तैयार रहे.. खैर आलोचना तो दुनिया में बड़े-बड़ों की हो गई...कोई इससे मजबूत हो गया तो कोई चलता बना.. अब देखते है कि कलमाड़ी साहब क्या रास्ता चुनते थे...फिलहाल तो वो सबसे भागते ही नजर आते हैं..चलिए अब तो पीएम मनमोहन सिंह ने भी कह दिया कि खेलों को राष्ट्रीय पर्व की तरह मनाना चाहिए... दिल्ली वाले तो इसे पर्व की तरह मनाएंगे ही...बच्चों के स्कूल ही जो बंद होंगे... बच्चे इन छुट्टियों का खूब मजा लेंगे और दुआ करेंगे कि ऐसे खेल हर साल हो...जिससे वो छुट्टी मना सके..कहते है कि बच्चों की दुआ भी जल्द कबूल हो जाती है...मुझे पूरी उम्मीद है दुआ तो इस वक्त खेलों से जुड़े अधिकारी और हर वो एजेंसी कर रही होगी...जिसपर गाज गिर सकती हो...मैं और आप इन घोटालेबाज़ों के लिए ना सही... लेकिन खेलों से अपने भारत की लाज बची रहे ये दुआ तो कर ही सकते है...तो चलिए फिर देर किस बात की..अगली बार.हम कॉमनवेल्थ खेलों और कॉमन भारतीयों में कॉमनता पर बात करेंगे...
नीचे आप अपने विचार मुझे बता सकते हैं...
मैं सोचता लोगों को अब क्यों कमियां खल रही है.. पहले हम और आप क्यों मान बैठे थे कि कॉमनवेल्थ खेल हिट होंगे... खैर अभी खेलों को हिट -प्लॉप करार देना जल्दबाज़ी होगी...लेकिन इतना जरुर है कि घोटालों की परते खुलते ही काफी लोगों की कुर्सीयां चली जाएंगी...खेलों का बजट बढ़ते-बढ़ते 12 हजार करोड़ पहुंच गया...कोई कहता 12 नहीं 16 हजार करोड़... ये खुलासे तो खेलों के बाद होने वाले खेलों उर्फ बड़े-बड़े पोल खोलो पर छोड़ देना चाहिए...जवाहार लाल नेहरु स्टेडियम पर 961 करोड़ खर्च होने की बात की जा रही है... कहते है कि नेहरू स्टेडियम की छत पर ही 100 करोड़ का खर्च आ गया..अरे भाई विदेशी कोटेड ग्लास फाइबर से बनी छत है जो बड़े-बड़े आंधी तूफानों से स्टेडियम का बचाव करेगी...जैसे मैंने एक ब्लॉग में पहले भी जिक्र किया था कि थोड़ा बहुत पैसा गेहूं रखने वाले गोदामों की छतों पर भी खर्च कर दिया जाता...तो लाखों टन गेहूं हर साल जाया ना जाता..
दिल्ली की सीएम शीला जी कहती है कि हम तो ओलंपिक के लिए भी तैयार है.. कोई मैडम को समझाये कि वो दिल मजबूत रखे और खेलों के नाम पर आलोचना झेलने के लिए भी जरा तैयार रहे.. खैर आलोचना तो दुनिया में बड़े-बड़ों की हो गई...कोई इससे मजबूत हो गया तो कोई चलता बना.. अब देखते है कि कलमाड़ी साहब क्या रास्ता चुनते थे...फिलहाल तो वो सबसे भागते ही नजर आते हैं..चलिए अब तो पीएम मनमोहन सिंह ने भी कह दिया कि खेलों को राष्ट्रीय पर्व की तरह मनाना चाहिए... दिल्ली वाले तो इसे पर्व की तरह मनाएंगे ही...बच्चों के स्कूल ही जो बंद होंगे... बच्चे इन छुट्टियों का खूब मजा लेंगे और दुआ करेंगे कि ऐसे खेल हर साल हो...जिससे वो छुट्टी मना सके..कहते है कि बच्चों की दुआ भी जल्द कबूल हो जाती है...मुझे पूरी उम्मीद है दुआ तो इस वक्त खेलों से जुड़े अधिकारी और हर वो एजेंसी कर रही होगी...जिसपर गाज गिर सकती हो...मैं और आप इन घोटालेबाज़ों के लिए ना सही... लेकिन खेलों से अपने भारत की लाज बची रहे ये दुआ तो कर ही सकते है...तो चलिए फिर देर किस बात की..अगली बार.हम कॉमनवेल्थ खेलों और कॉमन भारतीयों में कॉमनता पर बात करेंगे...
नीचे आप अपने विचार मुझे बता सकते हैं...
Sunday, August 15, 2010
15 अगस्त ये कैसा दिन...
हर साल 15 अगस्त को मैं एक ही चीज सोचता हूं कि क्या अगस्त महीने की 15 तारीख ज्यादातर भारतीयों के लिए मात्र छुट्टी का दिन बनकर रह गई है... 2010 में इस दिन ने रविवार को आ कर इस बात पर मोहर लगाने की कोशिश भी
कर दी... कभी सोचा है 200 सालों तक गुलाम रहे भारतीय उस तारीख का कितनी बेसब्री से इंतज़ार करते होंगे...जिस दिन वो खुली हवा में सांस ले पाएंगे... वो जो चाहेंगे वो कर पाएंगे...भारत आजाद हुआ कई बलिदानों से... आज भारतीय युवाओं को आमिर खान की 5 फिल्मों के नाम रटे होंगे लेकिन मात्र 5 शहीद जो आजादी के लिए फांसी को चूम गए थे को बताने में पसीने छूट जाएंगे...ये आजाद भारत या आज के भारत की तस्वीर है...हम विचारों से तो आधुनिक हो रहे हैं लेकिन हम आज भी गुलाम है...गुलाम किसके गुलाम..अब अंग्रेज नहीं तो अंग्रेजी के गुलाम हैं हम... आज भारतीय हर जगह अंग्रेजी झाड़ना सम्मान की बात समझते हैं और हिन्दी बोलना अपमान समझा जाने लगा है। हमारे पड़ोसी देश चीन और रुस से हमें कुछ सीख लेने की जरूरत है...इन देशों में भी अंग्रेजी बोली जाती है लेकिन सिर्फ गुजारे के लिए.. जिससे वो दुनिया को समझ सके और उसका जवाब दे पाएं... उनकी राष्टभाषा उनके लिए सम्मान की बात है..और हमारे लिए अब तो बहुत देर हो गई लगती है...1947 के बाद ही ये कार्य शुरू किया जाना चाहिए.. आजादी के बाद जैसा सारा भारत जनसंख्या बढ़ाने में जुट गया...हमारी सरकार जब जागी तो ये आंकड़ा 100 करोड़ पार कर गया था
.हमारा देश बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है... पर उतनी ही तेज़ी से हमारे संस्कार पीछे छुटते जा रहे हैं...
1923 में एक पंजाबी युवक कहा करता था कि गौरे साहब जाएंगे तो भूरे साब आ जाएंगे...जो देश को खूब खाएंगे...वो हमारे नेता कहलाएंगे... ये भविष्यवाणी आजाद भारत पर बड़ी फिट बैठती है...वो युवक थे शहीद भगत सिंह.. देश के लिए छोटी सी उम्र में फांसी को चूमना... ये बात मुझे आज भी मुझे प्रेरित कर जाती है...
शहीदों की देशभक्ति मुझे कहती है कि उनके बलिदान ना जाएं जाया
मेरे भारत को फिर से गुलाम ना जाए बनाया... गुलाम ना जाए बनाया...
कर दी... कभी सोचा है 200 सालों तक गुलाम रहे भारतीय उस तारीख का कितनी बेसब्री से इंतज़ार करते होंगे...जिस दिन वो खुली हवा में सांस ले पाएंगे... वो जो चाहेंगे वो कर पाएंगे...भारत आजाद हुआ कई बलिदानों से... आज भारतीय युवाओं को आमिर खान की 5 फिल्मों के नाम रटे होंगे लेकिन मात्र 5 शहीद जो आजादी के लिए फांसी को चूम गए थे को बताने में पसीने छूट जाएंगे...ये आजाद भारत या आज के भारत की तस्वीर है...हम विचारों से तो आधुनिक हो रहे हैं लेकिन हम आज भी गुलाम है...गुलाम किसके गुलाम..अब अंग्रेज नहीं तो अंग्रेजी के गुलाम हैं हम... आज भारतीय हर जगह अंग्रेजी झाड़ना सम्मान की बात समझते हैं और हिन्दी बोलना अपमान समझा जाने लगा है। हमारे पड़ोसी देश चीन और रुस से हमें कुछ सीख लेने की जरूरत है...इन देशों में भी अंग्रेजी बोली जाती है लेकिन सिर्फ गुजारे के लिए.. जिससे वो दुनिया को समझ सके और उसका जवाब दे पाएं... उनकी राष्टभाषा उनके लिए सम्मान की बात है..और हमारे लिए अब तो बहुत देर हो गई लगती है...1947 के बाद ही ये कार्य शुरू किया जाना चाहिए.. आजादी के बाद जैसा सारा भारत जनसंख्या बढ़ाने में जुट गया...हमारी सरकार जब जागी तो ये आंकड़ा 100 करोड़ पार कर गया था
.हमारा देश बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है... पर उतनी ही तेज़ी से हमारे संस्कार पीछे छुटते जा रहे हैं...
1923 में एक पंजाबी युवक कहा करता था कि गौरे साहब जाएंगे तो भूरे साब आ जाएंगे...जो देश को खूब खाएंगे...वो हमारे नेता कहलाएंगे... ये भविष्यवाणी आजाद भारत पर बड़ी फिट बैठती है...वो युवक थे शहीद भगत सिंह.. देश के लिए छोटी सी उम्र में फांसी को चूमना... ये बात मुझे आज भी मुझे प्रेरित कर जाती है...
शहीदों की देशभक्ति मुझे कहती है कि उनके बलिदान ना जाएं जाया
मेरे भारत को फिर से गुलाम ना जाए बनाया... गुलाम ना जाए बनाया...
Thursday, August 12, 2010
मेरे देश में गेहू सड़ रहा है...
आज देश चाहे जितनी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है....
क्या दुनिया में ऐसा भी कोई देश है जहां इतना गेहूं सड़ रहा है
मै आपसे और अपने आप से पूछता हूं ये सवाल, खेलों के नाम पर छली गई आम जनता की खाल
कॊमनवेल्थ के नाम पर जितना उड़ाया गया सरकारी माल, तो गेहूं छुपाने में क्यों रहे हम कंगाल
स्टेडियमों को खूब चमकाया जा रहा है, लेकिन हमसे आजादी के 60 साल बाद भी गेहूं नहीं छुपाया जा रहा है
आज देश में गरीब भूख से मर रहा है..दो जून की रोटी के लिए लड़ रहा है... लेकिन मेरे देश में गेहूं सड़ रहा है... गेहूं सड़ रहा है
खेलों के बजाए इतना पैसा अगर गोदामों पर लगाया जाता.. तो मेरे देश का सोना...गेहूं जाया ना जाता..
देश में ऐसे बड़े खेल बेशक होने चाहिए.. लेकिन उससे पहले हमारे देशवासी भरपेट सोने चाहिए..
बच्चों भूख से नहीं रोने चाहिए... हर बच्चे के स्कूल जाने के सपने नहीं खोने चाहिए..आज मध्यवर्गीय भारतीय महंगाई से लड़ रहा है....जरुरी सामान खरीदने से पहले हमें क्यों सोचना पड़ रहा है...लेकिन मेरे देश में गेहूं सड़ रहा है... गेहूं सड़ रहा है...
पंजाब में थाली में अन्न छोड़ना पाप माना जाता है, लेकिन शर्म से ये बताना पड़ रहा है कि सबसे अधिक
गेहूं वही गेहूं सड़ रहा है.. और आंकड़ा बाकि राज्यों में भी बढ़ रहा है...हर राज्य सरकार का नुमाइंदा केंद्र पर आरोप मढ़ रहा है.. लेकिन मेरे देश में गेहूं सड़ रहा है...मेरे देश में गेहूं सड़ रहा है...
क्या दुनिया में ऐसा भी कोई देश है जहां इतना गेहूं सड़ रहा है
मै आपसे और अपने आप से पूछता हूं ये सवाल, खेलों के नाम पर छली गई आम जनता की खाल
कॊमनवेल्थ के नाम पर जितना उड़ाया गया सरकारी माल, तो गेहूं छुपाने में क्यों रहे हम कंगाल
स्टेडियमों को खूब चमकाया जा रहा है, लेकिन हमसे आजादी के 60 साल बाद भी गेहूं नहीं छुपाया जा रहा है
आज देश में गरीब भूख से मर रहा है..दो जून की रोटी के लिए लड़ रहा है... लेकिन मेरे देश में गेहूं सड़ रहा है... गेहूं सड़ रहा है
खेलों के बजाए इतना पैसा अगर गोदामों पर लगाया जाता.. तो मेरे देश का सोना...गेहूं जाया ना जाता..
देश में ऐसे बड़े खेल बेशक होने चाहिए.. लेकिन उससे पहले हमारे देशवासी भरपेट सोने चाहिए..
बच्चों भूख से नहीं रोने चाहिए... हर बच्चे के स्कूल जाने के सपने नहीं खोने चाहिए..आज मध्यवर्गीय भारतीय महंगाई से लड़ रहा है....जरुरी सामान खरीदने से पहले हमें क्यों सोचना पड़ रहा है...लेकिन मेरे देश में गेहूं सड़ रहा है... गेहूं सड़ रहा है...
पंजाब में थाली में अन्न छोड़ना पाप माना जाता है, लेकिन शर्म से ये बताना पड़ रहा है कि सबसे अधिक
गेहूं वही गेहूं सड़ रहा है.. और आंकड़ा बाकि राज्यों में भी बढ़ रहा है...हर राज्य सरकार का नुमाइंदा केंद्र पर आरोप मढ़ रहा है.. लेकिन मेरे देश में गेहूं सड़ रहा है...मेरे देश में गेहूं सड़ रहा है...
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